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ब्रह्मा विष्णु महेश्वर माया, और धर्मराय कहिये।


महाराज गरीबदास जी अपनी वाणी में कहते हैं: ब्रह्मा विष्णु महेश्वर माया, और धर्मराय कहिये। इन पाँचों मिल परपंच बनाया, वाणी हमरी लहिये।। इन पाँचों मिल जीव अटकाये, जुगन-जुगन हम आन छुटाये। बन्दी छोड़ हमारा नामं, अजर अमर है अस्थिर ठामं।। पीर पैगम्बर कुतुब औलिया, सुर नर मुनिजन ज्ञानी। येता को तो राह न पाया, जम के बंधे प्राणी।। धर्मराय की धूमा-धामी, जम पर जंग चलाऊँ। जौरा को तो जान न दूगां, बांध अदल घर ल्याऊँ।। काल अकाल दोहूँ को मोसूं, महाकाल सिर मूंडू। मैं तो तख्त हजूरी हुकमी, चोर खोज कूं ढूंढू।। मूला माया मग में बैठी, हंसा चुन-चुन खाई। ज्योति स्वरूपी भया निरंजन, मैं ही कर्ता भाई।। एक न कर्ता दो न कर्ता दश ठहराए भाई। दशवां भी धूंध्र में मिलसी सत कबीर दुहाई।। संहस अठासी द्वीप मुनीश्वर, बंधे मुला डोरी। ऐत्यां में जम का तलबाना, चलिए पुरुष कीशोरी।। मूला का तो माथा दागूं, सतकी मोहर करूंगा। पुरुष दीप कूं हंस चलाऊँ, दरा न रोकन दूंगा।। हम तो बन्दी छोड़ कहावां, धर्मराय है चकवै। सतलोक की सकल सुनावं , वाणी हमरी अखवै।। नौ लख पटट्न ऊपर खेलूं, साहदरे कूं रोकूं। द्वादस कोटि कटक सब काटूं, हंस पठाऊँ मोखूं।। चौदह भुवन गमन है मेरा, जल थल में सरबंगी। खालिक खलक खलक में खालिक, अविगत अचल अभंगी।। अगर अलील चक्र है मेरा, जित से हम चल आए। पाँचों पर प्रवाना मेरा, बंधि छुटावन धाये।। जहां ओंकार निरंजन नाहीं, ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं जाहीं। जहां कर्ता नहीं अन्य भगवाना, काया माया पिण्ड न प्राणा।। पाँच तत्व तीनों गुण नाहीं, जौरा काल उस द्वीप नहीं जाँहीं। अमर करूं सतलोक पठाँऊ, तातैं बन्दी छोड़ कहाऊँ।। बन्दी छोड़ कबीर गुसांइ। झिलमलै नूर द्रव झांइ।।

Satlok
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