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सुख-दुःख की महिमा


सुख - दुःख सिर ऊपर सहै, कबहु न छाडै संग | रंग न लागै और का, व्यापै सतगुरु रंग || सभी सुख - दुःख अपने सिर ऊपर सह ले, सतगुरु - सन्तो की संगर कभी न छोड़े | किसी ओर विषये या कुसंगति में मन न लगने दे, सतगुरु के चरणों में या उनके ज्ञान - आचरण के प्रेम में ही दुबे रहें | कबीर गुरु कै भावते, दुरहि ते दीसन्त | तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरंत || गुरु कबीर कहते हैं कि सतगुरु ज्ञान के बिरही के लक्षण दूर ही से दीखते हैं | उनका शरीर कृश एवं मन व्याकुल रहता है, वे जगत में उदास होकर विचरण करते हैं | दासातन हरदै बसै, साधुन सो अधिन | कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लवलीन || जिसके ह्रदे में सेवा एवं प्रेम भाव बसता है और सन्तो कि अधीनता लिये रहता है | वह प्रेम - भक्ति में लवलीन पुरुष ही सच्चा दास है | दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास | अब तो ऐसा होय रहूँ, पाँव तले कि घास || ऐसा दास होना कठिन है कि - "मैं दासो का दास हूँ | अब तो इतना नर्म बन कर के रहूँगा, जैसे पाँव के नीचे की घास " | लगा रहै सतज्ञान सो सबही बन्धन तोड़ | कहैं कबीर वा दास को, काल रहै हथजोड़ || जो सभी विषय - बंधनों को तोड़कर सदैव सत्य स्वरुप ज्ञान की स्तिति में लगा रहे | गुरु कबीर कहते हैं कि उस गुरु - भक्त के सामने काल भी हाथ जोड़कर सिर झुकायेगा |

Satlok
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