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Kabir Saheb ka Tretayug me awatar lena


त्रेतायुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का मुनिन्द्र नाम से प्राकाट्य Updated: January 19th, 2016 | Tags: Kabir Sahib, Tretayug, Muninder Rishi नल तथा नील को शरण में लेना त्रोतायुग में स्वयंभु (स्वयं प्रकट होने वाला) कविर्देव (कबीर परमेश्वर) रूपान्तर करके मुनिन्द्र ऋषि के नाम से आए हुए थे। अनल अर्थात् नल तथा अनील अर्थात् नील। दोनों आपस में मौसी के पुत्रा थे। माता-पिता का देहान्त हो चुका था। नल तथा नील दोनों शारीरिक व मानसिक रोग से अत्यधिक पीड़ीत थे। सर्व ऋषियों व सन्तों से कष्ट निवारण की प्रार्थना कर चुके थे। सर्व सन्तों ने बताया था कि यह आप का प्रारब्ध का पाप कर्म का दण्ड है, यह आपको भोगना ही पड़ेगा। इसका कोई समाधान नहीं है। दोनों दोस्त जीवन से निराश होकर मृत्यु का इंतजार कर रहे थे। एक दिन दोनों को मुनिन्द्र नाम से प्रकट पूर्ण परमात्मा का सतसंग सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। सत्संग के उपरांत ज्यों ही दोनों ने परमेश्वर कविर्देव (कबीर साहेब) उर्फ मुनिन्द्र ऋषि जी के चरण छुए तथा परमेश्वर मुनिन्द्र जी ने सिर पर हाथ रखा तो दोनों का असाध्य रोग छू मन्त्र हो गया अर्थात् दोनों नल तथा नील स्वस्थ हो गए। इस अद्धभुत चमत्कार को देख कर प्रभु के चरणों में गिर कर घण्टों रोते रहे तथा कहा आज हमें प्रभु मिल गया जिसकी तलाश थी तथा उससे प्रभावित होकर उनसे नाम (दीक्षा) ले लिया तथा मुनिन्द्र साहेब जी के साथ ही सेवा में रहने लगे। पहले संतों का समागम पानी की व्यवस्था देख कर नदी के किनारे पर होता था। नल और नील दोनों बहुत प्रभु प्रेमी तथा भोली आत्माएँ थी। परमात्मा में श्रद्धा बहुत थी। सेवा बहुत किया करते थे। समागमों में रोगी व वृद्ध व विकलांग भक्तजन आते तो उनके कपड़े धोते तथा बर्तन साफ करते। उनके लोटे और गिलास मांज देते थे। परंतु थे भोले से दिमाग के। कपड़े धोने लग जाते तो सत्संग में जो प्रभु की कथा सुनी होती उसकी चर्चा करने लग जाते। वे दोनों प्रभु चर्चा में बहुत मस्त हो जाते और वस्तुएँ दरिया के जल में डूब जाती। उनको पता भी नहीं चलता। किसी की चार वस्तु ले कर जाते तो दो वस्तु वापिस ला कर देते थे। भक्तजन कहते कि भाई आप सेवा तो बहुत करते हो, परंतु हमारा तो बहुत काम बिगाड़ देते हो। ये खोई हुई वस्तुएँ हम कहाँ से ले कर आयें? आप हमारी सेवा ही करनी छोड़ दो। हम अपनी सेवा आप ही कर लेंगे। फिर नल तथा नील रोने लग जाते थे कि हमारी सेवा न छीनों। अब की बार नहीं खोएँगे। परन्तु फिर वही काम करते। फिर प्रभु की चर्चा में लग जाते और वस्तुएँ दरिया जल में डूब जाती। भक्तजनों ने ऋषि मुनिन्द्र जी से प्रार्थना की कि कृपा नल तथा नील को समझाओ। ये न तो मानते है और मना करते हैं तो रोने लग जाते हैं। हमारी तो आधी भी वस्तुएँ वापिस नहीं लाते। ये नदी किनारे सत्संग में सुनी भगवान की चर्चा में मस्त हो जाते हैं और वस्तुएँ डूब जाती हैं। मुनिन्द्र साहेब ने एक दो बार तो उन्हें समझाया। वे रोने लग जाते थे कि साहेब हमारी ये सेवा न छीनों। सतगुरु मुनिन्द्र साहेब ने कहा बेटा नल तथा नील खूब सेवा करो, आज के बाद आपके हाथ से कोई भी वस्तु चाहे पत्थर या लोहा भी क्यों न हो जल में नहीं डुबेगी। मुनिन्द्र साहेब ने उनको यह आशीर्वाद दे दिया। आपने रामायण सुनी है। एक समय की बात है कि सीता जी को रावण उठा कर ले गया। भगवान राम को पता भी नहीं कि सीता जी को कौन उठा ले गया? श्री रामचन्द्र जी इधर उधर खोज करते हैं। हनुमान जी ने खोज करके बताया कि सीता माता लंकापति रावण (राक्षस) की कैद में है। पता लगने के बाद भगवान राम ने रावण के पास शान्ति दूत भेजे तथा प्रार्थना की कि सीता लौटा दे। परन्तु रावण नहीं माना। युद्ध की तैयारी हुई। तब समस्या यह आई कि समुद्र से सेना कैसे पार करें? भगवान श्री रामचन्द्र ने तीन दिन तक घुटनों पानी में खड़ा होकर हाथ जोड़कर समुद्र से प्रार्थना की कि रास्ता दे दे। परन्तु समुद्र टस से मस न हुआ। जब समुद्र नहीं माना तब श्री राम ने उसे अग्नि बाण से जलाना चाहा। भयभीत समुद्र एक ब्राह्मण का रूप बनाकर सामने आया और कहा कि भगवन सबकी अपनी-अपनी मर्यादाएँ हैं। मुझे जलाओ मत। मेरे अंदर न जाने कितने जीव-जंतु बसे हैं। अगर आप मुझे जला भी दोगे तो भी आप मुझे पार नहीं कर सकते, क्योंकि यहाँ पर बहुत गहरा गड्डा बन जायेगा, जिसको आप कभी भी पार नहीं कर सकते। समुद्र ने कहा भगवन ऐसा काम करो कि सर्प भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। मेरी मर्यादा भी रह जाए और आपका पुल भी बन जाए। तब भगवान श्री राम ने समुद्र से पूछा कि वह क्या विधि है ? ब्राह्मण रूप में खडे समुद्र ने कहा कि आपकी सेना में नल और नील नाम के दो सैनिक हैं। उनके पास उनके गुरुदेव से प्राप्त एक ऐसी शक्ति है कि उनके हाथ से पत्थर भी जल पर तैर जाते हैं। हर वस्तु चाहे वह लोहे की हो, तैर जाती है। श्री रामचन्द्र ने नल तथा नील को बुलाया और उनसे पूछा कि क्या आपके पास कोई ऐसी शक्ति है? नल तथा नील ने कहा कि हाँ जी, हमारे हाथ से पत्थर भी जल नहीं डुबंेगे। श्रीराम ने कहा कि परीक्षण करवाओ। उन नादानों (नल-नील) ने सोचा कि आज सब के सामने तुम्हारी बहुत महिमा होगी। उस दिन उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान मुनिन्द्र (कबीर साहेब) को यह सोचकर याद नहीं किया कि अगर हम उनको याद करेंगे तो कहीं श्रीराम ये न सोच लें कि इनके पास शक्ति नहीं है, यह तो कहीं और से मांगते हैं। उन्होंने पत्थर उठाकर पानी में डाला तो वह पत्थर पानी में डूब गया। नल तथा नील ने बहुत कोशिश की, परन्तु उनसे पत्थर नहीं तैरे। तब भगवान राम ने समुद्र की ओर देखा मानो कहना चाह रहे हों कि आप तो झूठ बोल रहे हो। इनमें तो कोई शक्ति नहीं है। समुद्र ने कहा कि नल-नील आज तुमने अपने गुरुदेव को याद नहीं किया। नादानों अपने गुरुदेव को याद करो। वे दोनों समझ गए कि आज तो हमने गलती कर दी। उन्होंने सतगुरु मुनिन्द्र साहेब जी को याद किया। सतगुरु मुनिन्द्र (कबीर साहेब) वहाँ पर पहुँच गए। भगवान रामचन्द्र जी ने कहा कि हे ऋषिवर! मेरा दुर्भाग्य है कि आपके सेवकों के हाथों से पत्थर नहीं तैर रहे हैं। मुनिन्द्र साहेब ने कहा कि अब इनके हाथ से तैरेंगे भी नहीं, क्योंकि इनको अभिमान हो गया है। सतगुरु की वाणी प्रमाण करती है किः- गरीब, जैसे माता गर्भ को, राखे जतन बनाय। ठेस लगे तो क्षीण होवे, तेरी ऐसे भक्ति जाय। उस दिन के पश्चात् नल तथा नील की वह शक्ति समाप्त हो गई। श्री रामचन्द्र जी ने परमेश्वर मुनिन्द्र साहेब जी से कहा कि हे ऋषिवर! मुझ पर बहुत आपत्ति आयी हुई है। दया करो किसी प्रकार सेना परले पार हो जाए। जब आप अपने सेवकों को शक्ति दे सकते हो तो प्रभु कुछ रजा करो। मुनिन्द्र साहेब ने कहा कि यह जो सामने वाला पहाड़ है, मैंने उसके चारों तरफ एक रेखा खींच दी है। इसके बीच-बीच के पत्थर उठा लाओ, वे नहीं डूबेंगे। श्री राम ने परीक्षण के लिए पत्थर मंगवाया। उसको पानी पर रखा तो वह तैरने लग गया। नल तथा नील कारीगर (शिल्पकार) भी थे। हनुमान जी प्रतिदिन भगवान याद किया करते थे। उसने अपनी दैनिक क्रिया भी साथ रखी राम राम भी लिखता रहा और पहाड़ के पहाड़ उठा कर ले आता था। नल नील उनको जोड़-तोड़ कर पुल में लगा लेते थे। इस प्रकार पुल बना था। धर्मदास जी कहते हैं:- रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरू से करी पुकार। जा सत रेखा लिखी अपार, सिन्धु पर शिला तिराने वाले। धन-धन सतगुरु सत कबीर, भक्त की पीर मिटाने वाले। कोई कहता था कि हनुमान जी ने पत्थर पर राम का नाम लिख दिया था इसलिए पत्थर तैर गये। कोई कहता था कि नल-नील ने पुल बनाया था। कोई कहता था कि श्रीराम ने पुल बनाया था। परन्तु यह सत कथा ऐसे है, जैसे आपको ऊपर बताई गई है। (सत कबीर की साखी - पृष्ठ 179 से 182 तक) -: पीव पिछान को अंग :- कबीर- तीन देव को सब कोई ध्यावै, चैथे देव का मरम न पावै। चैथा छाड़ पंचम को ध्यावै, कहै कबीर सो हम पर आवै।।3।। कबीर- ओंकार निश्चय भया, यह कर्ता मत जान। साचा शब्द कबीर का, परदे मांही पहचान।।5।। कबीर- राम कृष्ण अवतार हैं, इनका नांही संसार। जिन साहेब संसार किया, सो किन्हूं न जन्म्या नार।।17।। कबीर - चार भुजा के भजन में, भूलि परे सब संत। कबिरा सुमिरो तासु को, जाके भुजा अनंत।।23।। कबीर - समुद्र पाट लंका गये, सीता को भरतार। ताहि अगस्त मुनि पीय गयो, इनमें को करतार।।26।। कबीर - गोवर्धनगिरि धारयो कृष्ण जी, द्रोणागिरि हनुमंत। शेष नाग सब सृष्टी सहारी, इनमें को भगवंत।।27।। कबीर - काटे बंधन विपति में, कठिन किया संग्राम। चिन्हों रे नर प्राणियां, गरुड बड़ो की राम।।28।। कबीर - कह कबीर चित चेतहंू, शब्द करौ निरूवार। श्रीरामहि कर्ता कहत हैं, भूलि परयो संसार।।29।। कबीर - जिन राम कृष्ण व निरंजन कियो, सो तो करता न्यार। अंधा ज्ञान न बूझई, कहै कबीर विचार।।30।।
Kabir Ji ka kalyug me Awataran
BantiKumar. page.tl on 06/29/2016 at 8:31am (UTC)
 Kabir Sahib कबीर साहेब ( कविर्देव ) का कलियुग में प्राकाट्य विक्रमी संवत् 1455 ( सन् 1398 ) ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा सुबह -सुबह ब्रह्ममुहुर्त में वह पूर्ण परमेश्वर कबीर ( कविर्देव ) जी स्वयं अपने मूल स्थान सतलोक से आए। काशी में लहर तारा तालाब के अंदर कमल के फूल पर एक बालक का रूप धारण किया। पहले मैं आपको नीरू -नीमा के बारे में बताना चाहूँगा कि ये कौन थे ? नीरू- नीमा कौन थे द्वापर युग में नीरू -नीमा सुपच सुदर्शन के माता पिता थे। इन्होंने कबीर साहेब की बात को उस समय स्वीकार नहीं किया था। अंत में सुदर्शन ने करूणामय रूप में आए कबीर साहेब से प्रार्थना की थी कि प्रभु आपने मुझे उपदेश दे दिया तो सब कुछ दे दिया। आपसे आज तक कुछ माँगने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी। क्योंकि आपने सर्व मनोकामना पूर्ण कर दी तथा जो वास्तविक भक्ति धन है उससे भी परिपूर्ण कर दिया। एक प्रार्थना है दास की यदि उचित समझो तो स्वीकार कर लेना। मेरे माता पिता यदि किसी जन्म में कभी मनुष्य शरीर प्राप्त करें तो इनको संभालना प्रभु। ये बहुत पुण्यात्मा हैं , लेकिन आज इनकी बुद्धि विपरीत हो गई है। ये परमात्मा की वाणी को मान नहीं रहे। कबीर साहेब ने कहा चिंता न कर , अब तू अपने माता पिता के चक्कर में यहाँ उलझ जायेगा। आने दे समय इनको भी संभालूंगा। काल जाल से पार करूँगा। तू निश्चिंत होकर सतलोक जा। सुदर्शन जी सतलोक चले गये। सुदर्शन के माता-पिता के कलयुग में नीरू -नीमा के जन्म से पहले भी ब्राह्मण घर में इनके दो जन्म हुए, उस समय भी निःसंतान ही रहे। फिर तीसरा मनुष्य जन्म काशी में हुआ। उस समय भी वे ब्राह्मण और ब्राह्मणी ( गौरी शंकर और सरस्वती के नाम से) थे , संतान फिर भी नहीं थी। नीरू तथा नीमा दोनों गौरी शंकर और सरस्वती नाम के ब्राह्मण जाति से थे। ये भगवान शिव के उपासक थे। भगवान शिव की महिमा शिव पुराण से निःस्वार्थ भाव से भक्तात्माओं को सुनाया करते थे। किसी से पैसा नहीं लेते थे। इतने नेक आत्मा थे कि यदि कोई उनको अपने आप दक्षिणा दे जाता था , उसमें से अपने भोजन योग्य रख लेते थे और जो बच जाता था उसका भण्डारा कर देते थे। अन्य स्वार्थी ब्राह्मण गौरी शंकर तथा सरस्वती से इष्र्या रखते थे क्योंकि गौरी शंकर निस्वार्थ कथा किया करते थे। पैसे के लालच में भक्तों को गुमराह नहीं करते थे , जिस कारण से प्रशंसा के पात्रा बने हुए थे। उधर से मुस्लमानों को ज्ञान हो गया कि इनके साथ कोई हिन्दू, ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने इसका लाभ उठाया और बलपूर्वक उनको मुस्लमान बना दिया। मुस्लमानों ने अपना पानी उनके सारे घर में छिड़क दिया तथा उनके मुँह में भी डाल दिया , सारे कपड़ों पर छिड़क दिया। उससे हिन्दू ब्राह्मणों ने कहा कि अब ये मुस्लमान बन गए हैं। आज के बाद इनका हमारे से कोई भाई -चारा नहीं रहेगा। ‘‘ नीरू- नीमा को जुलाहे की उपाधि तथा परमेश्वर प्राप्ति ’’ बेचारे गौरी शंकर तथा सरस्वती विवश हो गए। मुसलमानों ने पुरुष का नाम नीरू तथा स्त्राी का नाम नीमा रखा। पहले उनके पास जो पूजा आती थी उससे उनकी रोजी- रोटी चल रही थी और जो कोई रूपया -पैसा बच जाता था वे उसका दुरूपयोग नहीं करते थे। उस बचे धन से धर्म -भण्डारा कर देते थे। पूजा आनी भी बंद हो गई। उन्होंने सोचा अब क्या काम करें ? उन्होंने एक कपड़ा बुनने की खड्डी लगा ली और जुलाहे का कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। कपड़ा बुन कर निर्वाह करने लगे कपड़े की बुनाई से घर के खर्च के पश्चात् जो पैसा बच जाता था उसको भण्डारों में लगा देते थे। हिन्दू ब्राह्मणों ने नीरू -नीमा का गंगा घाट पर गंगा दरिया में स्नान करना बंद कर दिया था। कहते थे कि अब तुम मुसलमान हो गए हो। गंगा दरिया का ही पानी लहरों के द्वारा उछल कर काशी में एक लहरतारा नामक बहुत बड़े सरोवर को भरकर रखता था। बहुत निर्मल जल भरा रहता था। उसमें कमल के फूल उगे हुए थे। सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455 ) ज्येष्ठ मास शुद्धि पूर्णमासी को ब्रह्ममूहूर्त ( सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टा पहले ) में अपने सत्यलोक ( ऋतधाम) से सशरीर आकर परमेश्वर कबीर ( कविर्देव ) बालक रूप बनाकर लहर तारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। उसी लहर तारा तालाब पर नीरू -नीमा सुबह - सुबह ब्रह्ममुहुर्त में स्नान करने के लिए प्रतिदिन जाया करते थे। ( ब्रह्ममुहुर्त कहते हैं सूर्योदय होने से डेढ घण्टा पूर्व ) एक बहुत तेजपुंज का चमकीला गोला ( बालक रूप में परमेश्वर कबीर साहेब जी तेजोमय शरीर युक्त आए थे , दूरी के कारण प्रकाश पुंज ही नजर आता है ) ऊपर से ( सत्यलोक से) आया और कमल के फूल पर सिमट गया। जिससे सारा लहर तारा तालाब जगमग -जगमग हो गया था और फिर एक कोने में जाकर वह अदृश्य हो गया। इस दृश्य को स्वामी रामानन्द जी 104 कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं के एक शिष्य ऋषि अष्टानन्द जी आँखों देख रहे थे। अष्टानंद जी भी स्नान करने के लिए एकांत स्थान पर उसी लहर तारा तालाब पर प्रतिदिन जाया करते थे। वहाँ बैठकर अपनी साधना गुरुदेव ने जो मंत्रा दिए थे उसका जाप करते थे और प्रकृति का आनन्द लिया करते थे। स्वामी अष्टानंद जी ने जब देखा कि इतना तेज प्रकाश जिससे आँखे भी चैंधिया गई। ऋषि जी ने सोचा कि ये कोई मेरी भक्ति की उपलब्धि है या मेरा धोखा है। यह सोचकर कारण पूछने के लिए अपने गुरुदेव के पास गए। आदरणीय रामानन्द जी से अष्टानन्द जी ने पूछा कि हे गुरुदेव! मैंने आज ऐसी रोशनी देखी है जो कि जिन्दगी में कभी नहीं देखी। सर्व वृतांत बताया कि आकाश से एक प्रकाश समूह आ रहा था। मैंने देखा तो मेरी आँखें उस रोशनी को सहन नहीं कर सकी। इस लिए बन्द हो गई , बंद आँखों में एक शिशु का रूप दिखाई दिया। (जैसे सूर्य की तरफ देखने के पश्चात सूर्य का एक गोला- सा ही दिखाई देता है , ऐसे बालक दिखाई देने लगा )। क्या यह मेरी भक्ति की कोई उपलब्धि है या मेरा दृष्टिदोष था? स्वामी रामानन्द जी ने कहा कि पुत्रा ऐसे लक्षण तब होते हैं जब ऊपर के लोकों से कोई अवतारगण आते हैं। वे किसी के यहाँ प्रकट होंगे , किसी माँ के जन्म लेंगे और फिर लीला करेंगे। ( क्योंकि इन ऋषियों को इतना ही ज्ञान है कि माँ से ही जन्म होता है ) जितना ऋषि को ज्ञान था अपने शिष्य का शंका समाधान कर दिया। नीरू व नीमा प्रतिदिन की तरह उस दिन भी स्नान करने जा रहे थे। रास्ते में नीमा ने प्रभु से प्रार्थना की कि हे भगवान शिव ( क्योंकि वे भले ही मुस्लमान बन गए थे लेकिन अपनी वह साधना हृदय से नहीं भूल पा रहे थे जो इतने वर्षों से कर रहे थे। ) क्या आपके घर में हमारे लिए एक बच्चे की कमी पड़ गई ? हमंे भी एक लाल दे देते , हमारा जीवन भी सफल हो जाता। ऐसा कहकर फूट -फूट कर रोने लगी। उसके पति नीरू ने कहा कि नीमा प्रभु की इच्छा पर प्रसन्न रहने में ही हित होता है। यदि ऐसे रोती रहेगी तो तेरा शरीर कमजोर हो जायेगा , आँखों से दिखना बंद हो जायेगा। हमारे भाग्य में संतान नहीं है। ऐसे कहते -कहते लहर तारा तालाब पर पहुँच गए। थोड़ा - थोड़ा अंधेरा था। नीमा स्नान करके बाहर आई। अपने कपड़े बदले। नीरू स्नान करने के लिए तालाब में प्रवेश करके गोते मार - मार कर नहाने लगा। नीमा जब स्नान करते समय पहना हुआ कपड़ा धोने के लिए दोबारा तालाब के किनारे पर गई , तब तक अंधेरा हट गया था। सूर्य उदय होने वाला ही था। नीमा ने तालाब में देखा कि सामने कमल के फूल पर कोई वस्तु हिल रही है। कबीर साहेब ने बच्चे के रूप में एक पैर का अँगूठा मुख में दे रखा था और एक पैर को हिला रहे थे। पहले तो नीमा ने सोचा कि शायद कोई सर्प न हो और मेरे पति की तरफ आ रहा हो। फिर ध्यान से देखा तो समझते देर न लगी कि ये तो कोई बच्चा है। बच्चा और कमल के फूल पर। एकदम अपने पति को आवाज लगाई कि देखना जी बच्चा डूबेगा , बच्चा डूबेगा। नीरू बोला कि नादान तू बच्चों के चक्कर में पागल हो गई है। पानी में भी तुझे बच्चा नजर आने लगा। नीमा ने कहा हाँ , वह सामने कमल के फूल पर देखो। नीमा की जोरदार आवाज से प्रभावित होकर जिस तरफ हाथ से संकेत कर रही थी नीरू ने उधर देखा, एक कमल के फूल पर नवजात शिशु लेटा हुआ था। नीरू उस बच्चे को फूल समेत उठा लाए और नीमा को दे दिया। स्वयं स्नान करने लगा। नीरू स्नान करके बाहर आया नीमा बच्चे के रूप में आए परमेश्वर को बहुत प्यार कर रही थी तथा शिव प्रभु की प्रसंशा तथा स्तुति कर रही थी कि हे प्रभु आपने मेरी वर्षों की मनोकामना पूर्ण कर दी। (क्योंकि वह शिव की पुजारिन थी। ) कह रही थी हे शिव प्रभु आज ही हृदय से पुकार की थी, आज ही सुन ली। उस कबीर परमेश्वर को जिसका नाम लेने से हमारे हृदय में एक विशेष हलचल -सी होती है , उसके प्रेम में रोम -रोम खड़ा हो जाता है , आत्मा भर कर आती है और जिस माता-बहन ने सीने से लगाकर पुत्रावत प्यार किया जो आनन्द उस माई को हुआ होगा। वह अवर्णनीय है। जैसे व्यक्ति गुड़ खा कर अन्य को उस के आनन्द को नहीं बता सकता खाने वाला ही जान सकता है। जैसे माँ प्यार करती है ऐसे शिशु रूपधारी परमेश्वर के कभी मुख को चूमा , कभी सीने से लगा रही थी और फिर बार - बार उसके मुख को देख रही थी। इतने में नीरू स्नान करके बाहर आया। (क्योंकि मनुष्य समाज की तरफ ज्यादा देखता है ) उसने विचार लगाया कि न तो अभी मुस्लमानों से हमारा कोई विशेष प्यार बना है और हिन्दू ब्राह्मण हमारे से द्वेष करते हैं। पहले इसी अवसर का लाभ मुस्लमानों ने उठाया कि हमें मुस्लमान बना दिया। हमारा कोई साथी नहीं है। यदि हम इस बच्चे को ले जायेंगे तो लोग पूछेगें कि बताओ इस बच्चे के माता- पिता कौन हैं ? तुम किसी का बच्चा उठा कर लाए हो। इसकी माँ रो रही होगी। हम क्या जवाब देंगे , कैसे बतायेंगे ? कमल के फूल पर बतायेंगे तो कोई मानेगा नहीं। यह सर्व विचार करके नीरू ने कहा कि नीमा इस बच्चे को यहीं छोड़ दे। नीमा ने कहा कि जी मैं इस बच्चे को नहीं छोड़ सकती। मेरे प्राण जा सकते हैं , मैं तड़फ कर मर जाऊँगी। न जाने मेरे ऊपर इस बालक ने क्या जादू कर दिया ? मैं इसको नहीं छोड़ सकती। नीरू ने नीमा को सारी बात समझाई कि हमारे साथ ऐसा बन सकता है। नीमा ने कहा कि इस बच्चे के लिए मैं देश निकाला भी ले सकती हूँ परन्तु इसको नहीं छोडूंगी। नीरू ने उसकी नादानी को देख कर सोचा कि यह तो पागल हो गई , समाज को भी नहीं देख रही है। नीरू ने नीमा से कहा कि मैंने आज तक तेरी बात की अवहेलना नहीं की थी क्योंकि हमारे बच्चे नहीं थे। जो तू कहती रही मैं स्वीकार करता रहा। परन्तु आज मैं तेरी यह बात नहीं मानूंगा। या तो इस बालक को यहीं पर रख दे , नहीं तो तुझे अभी दो थप्पड़ लगाता हूँ। उस महापुरुष ने पहली बार अपनी पत्नी की तरफ हाथ किया था। उसी समय शिशु रूप में कबीर परमेश्वर 1 ⁄ 4 कविर्देव 1 ⁄2 ने कहा कि नीरू मुझे घर ले चलो। तुम्हें कोई आपत्ति नहीं आयेगी। शिशु रूप में परमेश्वर के वचन सुनकर नीरू घबरा गया कहीं यह बालक कोई फरिश्ता हो अथवा कोई सिद्ध पुरुष हो और तेरे ऊपर कोई आपत्ति न आ जाए। चुप करके चल पड़ा। जब बच्चे को लेकर घर आ गए तो सभी यह पूछना तो भूल गये कि कहाँ से लाए हो ? काशी के स्त्राी तथा पुरुष लड़के को देखने आए तथा कहने लगे कि यह तो कोई 106 कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं देवता नजर आता है। इतना सुन्दर शरीर , ऐसा तेजोमय बच्चा पहले कभी हमने नहीं देखा। कोई कहे यह तो ब्रह्मा - विष्णु -महेश में से कोई प्रभु है। ब्रह्मा -विष्णु -महेश कहते हैं कि यह तो कोई ऊपर के लोकों से आई हुई शक्ति है। ऐसे सब अपनी -अपनी टिप्पणी कर रहे थे। गरीब , चैरासी बंधन काटन , कीनी कलप कबीर। भवन चतुरदश लोक सब , टूटैं जम जंजीर।।376 ।। गरीब , अनंत कोटि ब्रह्मांड में , बंदी छोड़ कहाय। सो तौ एक कबीर हैं , जननी जन्या न माय।।377 ।। गरीब , शब्द स्वरूप साहिब धनी, शब्द सिंध सब माँहि। बाहर भीतर रमि रह्या, जहाँ तहां सब ठांहि।। 378 ।। गरीब , जल थल पृथ्वी गगन में , बाहर भीतर एक। पूरणब्रह्म कबीर हैं , अविगत पुरूष अलेख।। 379 ।। गरीब , सेवक होय करि ऊतरे, इस पृथ्वी के माँहि। जीव उधारन जगतगुरु, बार बार बलि जांहि।। 380 ।। गरीब , काशीपुरी कस्त किया , उतरे अधर अधार। मोमन कूं मुजरा हुवा , जंगल में दीदार।।381 ।। गरीब , कोटि किरण शशि भान सुधि , आसन अधर बिमान। परसत पूरणब्रह्म कूं, शीतल पिंडरू प्राण।। 382 ।। गरीब , गोद लिया मुख चूंबि करि , हेम रूप झलकंत। जगर मगर काया करै , दमकैं पदम अनंत।। 383 ।। गरीब , काशी उमटी गुल भया , मोमन का घर घेर। कोई कहै ब्रह्मा विष्णु हैं , कोई कहै इन्द्र कुबेर।। 384 ।। गरीब , कोई कहै छल ईश्वर नहीं , कोई किंनर कहलाय। कोई कहै गण ईश का , ज्यूं ज्यूं मात रिसाय।। 388 ।। गरीब , कोई कहै वरूण धर्मराय है , कोई कोई कहते ईश। सोलह कला सुभांन गति , कोई कहै जगदीश।। 385 ।। गरीब , भक्ति मुक्ति ले ऊतरे , मेटन तीनूं ताप। मोमन के डेरा लिया , कहै कबीरा बाप।।386 ।। गरीब , दूध न पीवै न अन्न भखै , नहीं पलने झूलंत। अधर अमान धियान में , कमल कला फूलंत।। 387 ।। गरीब , काशी में अचरज भया , गई जगत की नींद। एैसे दुल्हे ऊतरे , ज्यूं कन्या वर बींद।। 389 ।। गरीब , खलक मुलक देखन गया , राजा प्रजा रीत। जंबूदीप जिहाँन में , उतरे शब्द अतीत।।390 ।। गरीब , दुनी कहै योह देव है , देव कहत हैं ईश। ईश कहै पारब्रह्म है , पूरण बीसवे बीस।।391 ।। परमेश्वर कबीर जी ही अनादि परम गुरु हैं। वे ही रूपान्तर करके सन्त व ऋषि वेश में समय -समय पर 1 ⁄ 4 स्वयंभू 1 ⁄ 2 स्वयं प्रकट होते हैं। काल के दूतों ( सन्तो ) द्वारा बिगाड़े तत्वज्ञान को स्वस्थ करते हैं। कबीर साहेब ने ही ब्रह्मा , विष्णु , शिव आदि देवताओं , ऋषि मुनी व संतों को समय -2 पर अपने सतलोक से आकर नाम उपदेश दिया। आदरणीय गरीबदास जी महाराज ने अपनी वाणी में लिखा है जो कबीर जी ने स्वयं बताया है : - - आदि अंत हमरा नहीं , मध्य मिलावा मूल। ब्रह्मा ज्ञान सुनाईया , धर पिंडा अस्थूल।। श्वेत भूमिका हम गए , जहां विश्वम्भरनाथ। हरियम् हीरा नाम दे , अष्ट कमल दल स्वांति।। हम बैरागी ब्रह्म पद , सन्यासी महादेव। सोहं मंत्रा दिया शंकर कूं, करत हमारी सेव।। हम सुल्तानी नानक तारे , दादू कूं उपदेश दिया। जाति जुलाहा भेद न पाया, काशी माहे कबीर हुआ।। सतयुग में सतसुकृत कह टेरा , त्रोता नाम मुनिन्द्र मेरा। द्वापर में करूणामय कहलाया, कलियुग में नाम कबीर धराया।। चारों युगों में हम पुकारैं , कूक कहैं हम हेल रे। हीरे मानिक मोती बरसें, ये जग चुगता ढेल रे। उपरोक्त वाणी से सिद्ध है कि कबीर परमेश्वर ही अविनाशी परमात्मा है। यही अजरो -अमर है। यही परमात्मा चारों युगों में स्वयं अतिथि रूप में कुछ समय के लिए इस संसार में आकर अपना सतभक्ति मार्ग देते हैं।
 
Comment posted by Marvsuign( amatry-rx.com ), 05/07/2017 at 10:12am (UTC):
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Comment posted by bks( Bantikumarpksyahoo.com ), 08/31/2016 at 1:39am (UTC):


Nanak Saheb in Hindi
Banti Kumar Chandoliya on 06/28/2016 at 9:22am (UTC)
 गुरु नानक

गुरु नानक देव जी
Guru Nanak with Bhai Bala, Bhai Mardana and Sikh Guru
१९वीं शताब्दी में निर्मित तंजौर शैली का चित्र जिसमें गुरु नानक जी के साथ सभी सिख गुरु दिखाई दे रहे हैं।
जन्म नानक
कार्तिक पूर्णिमा, संवत् १५२७ अथवा 15 अप्रैल 1469
राय भोई की तलवंडी, (वर्तमान ननकाना साहिब, पंजाब, पाकिस्तान, पाकिस्तान)
मृत्यु 22 सितंबर 1539
करतारपुर
समाधि स्थल करतारपुर
व्यवसाय सिखधर्म के संस्थापक
सक्रिय वर्ष 1499–1539
पूर्वाधिकारी गुरु अंगद देव

१९वीं शताब्दी में निर्मित तंजौर शैली का चित्र जिसमें गुरु नानक जी के साथ सभी सिख गुरु दिखाई दे रहे हैं।
गुरू नानक (पंजाबी: ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ) (15 अप्रैल 1469 – 22 सितंबर 1539) सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) हैं। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, गुरु नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे।

परिचय


गुरुद्वारा ननकाना साहिब
इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में 15 अप्रैल, 1469 में कार्तिकी पूर्णिमा को एक खत्रीकुल में हुआ था। इनके पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। इनकी बहन का नाम नानकी था।


विद्यालय जाते हुए बालक नानक
बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य ऴ्यक्तित्व मानने लगे। बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे।


नानक के सिर पर सर्प द्वारा छाया करने का दृश्य देखकर राय बुलार का नतमस्तक होना
इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। चार वर्ष पीछे दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत १५०७ में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़।

उदासियाँ


गुरु नानाक देव जी की यात्राएं
ये चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे। १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में "guru" कहा जाता है।

दर्शन


मक्का में गुरु नानक देव जी
नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। लोगों ने तत्कालीन इब्राहीम लोदी से इनकी शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे। अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ।

मृत्यु

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।
कवित्व

नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।

रचनाएँ

गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित 974 शब्द (19 रागों में), गुरबाणी में शामिल है- जपजी, Sidh Gohst, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, Patti, बारह माह
 

Kabir Ji ke Dohe
Banti Kumar on 06/28/2016 at 9:15am (UTC)
  साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय|

अर्थ:- कबीर दास जी कहते कि हे परमात्मा तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमे मेरे गुजरा चल जाये| मैं भी भूखा न रहूँ और अतिथि भी भूखे वापस न जाए|

दोहा:- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय

जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय|

अर्थ:- कबीर कहते कि सुख में भगवान को कोई याद नहीं करता लेकिन दुःख में सभी भगवान से प्रार्थना करते है| अगर सुख में भगवान को याद किया जाये तो दुःख क्यों होगा|

दोहा:- तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैर में आने वाले तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकिं अगर वही तिनका आँख में चला जाए तो बहुत पीड़ा होगी|

दोहा:- साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता और कभी भी धन का भूखा नहीं होता| और जो धन का भूखा होता है वह साधू नहीं हो सकता|

दोहा:- माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ:- कबीर जी कहते है कि कुछ लोग वर्षों तक हाथ में लेकर माला फेरते है लेकिन उनका मन नहीं बदलता अर्थात् उनका मन सत्य और प्रेम की ओर नहीं जाता| ऐसे व्यक्तियों को माला छोड़कर अपने मन को बदलना चाहिए और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए|

दोहा:- जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है अगर हमारा मन शीतल है तो इस संसार में हमारा कोई बैरी नहीं हो सकता| अगर अहंकार छोड़ दें तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है|

दोहा:- जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि हम जैसा भोजन करते है वैसा ही हमारा मन हो जाता है और हम जैसा पानी पीते है वैसी ही हमारी वाणी हो जाती है|

दोहा:- कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।

अर्थ:- बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है|

दोहा:- जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ|

अर्थ:- जो जितनी मेहनत करता है उसे उसका उतना फल अवश्य मिलता है| गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ ले कर ही आता है, लेकिन जो डूबने के डर से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं वे कुछ नहीं कर पाते हैं
 

Kabir ji ke dohe
Banti Kumar Chandoliya on 06/28/2016 at 9:14am (UTC)
 संत कबीर (Kabir) जी का हिंदी साहित्य (Hindi Sahitya) में विशिष्ट स्थान है| वे बड़ी बड़ी बातों को अपने दोहों के माध्यम से बड़ी सरलता से समझा देते थे| कबीर दास के दोहे (Kabir ke Dohe) समझकर इन्सान यह समझ जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं| उनके दोहे हिन्दू मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित करते है और यह बतलाते है कि लोग धर्म के नाम पर आपस में झगड़ते है लेकिन इस सच्चाई को नहीं जान पाते कि भगवान तो सभी के होते है|

संत कबीर के दोहे – Kabir Ke Dohe

दोहा:- हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मरे, मरम न जाना कोई।

अर्थ : कबीर दास जी कहते है कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों (तुर्क) को रहमान| इसी बात पर वे आपस में झगड़ते रहते है लेकिन सच्चाई को नहीं जान पाते |


दोहा:- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब |

अर्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो| जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्त हो गया तो क्या करोगे|

दोहा:- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय|

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि हमेशा धैर्य से काम लेना चाहिए| अगर माली एक दिन में सौ घड़े भी सींच लेगा तो भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेंगे|

दोहा:- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय|

अर्थ:- कबीर जी कहते है कि निंदा करने वाले व्यक्तियों को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्ति बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को स्वच्छ कर देते है|

दोहा:- माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख

माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख|

अर्थ:- कबीरदास जी कहते कि माँगना मरने के समान है इसलिए कभी भी किसी से कुछ मत मांगो|





 

kabir saheb news
Banti KUMAR on 06/28/2016 at 9:09am (UTC)
 New news Kabir Ke Dohe Added

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन.

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन.

अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया. कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है.


कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।



जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.



कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस.
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस.
अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.



पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.

एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात.

अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.



हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.

सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.

अर्थ : यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है. —



जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।

जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ : इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा.



झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.

खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है.



ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस.

भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस.

अर्थ : कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता. —



संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत

चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ : सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता.



कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ.

जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.



तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.

सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.

अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.



कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय.

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.



माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.

आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .

अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.



मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई.

पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई.

अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.



जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

अर्थ : जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया.



कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

अर्थ : कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो.सजग होकर प्रभु का ध्यान करो.वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?



आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

अर्थ : देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं



रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थ : रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी –
 
Comment posted by Pankaj( ), 06/28/2016 at 9:18am (UTC):


kabir saheb news
Banti KUMAR on 06/28/2016 at 9:09am (UTC)
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कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन.

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन.

अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया. कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है.


कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।



जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.



कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस.
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस.
अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.



पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.

एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात.

अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.



हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.

सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.

अर्थ : यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है. —



जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।

जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ : इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा.



झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.

खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है.



ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस.

भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस.

अर्थ : कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता. —



संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत

चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ : सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता.



कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ.

जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.



तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.

सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.

अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.



कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय.

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.



माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.

आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .

अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.



मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई.

पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई.

अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.



जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

अर्थ : जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया.



कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

अर्थ : कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो.सजग होकर प्रभु का ध्यान करो.वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?



आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

अर्थ : देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं



रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थ : रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी –
 
Comment posted by Pankaj( ), 06/29/2016 at 2:13am (UTC):
Huh


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